बीजेपी-RSS ने बना लिया 2029 का भी प्लान! क्या हैं पीएम मोदी के दौरे के मायने

नई दिल्ली

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी राजनीतिक सफलता का श्रेय आरएसएस को हमेशा ही देते रहे हैं। हालांकि 11 साल प्रधानमंत्री रहने के बाद वह रविवार को पहली बार आरएसएस के मुख्यालय पहुंचे। पीएम मोदी इससे पहले 2013 में लोकसभा चुनाव की बैठक को लेकर नागपुर आए थे। पीएम मोदी ने आरएसएस के संस्थापक डॉ. केबी हेडगेवार के स्मारक पर जाकर श्रद्धांजलि दी। उन्होंने आरएसएस की तारीफ खरते हुए कहा कि यह एक संगठन नहीं बल्कि राजनीति की आत्मा है। उन्होंने कहा कि संघ एक अमर संस्कृति के वट वृक्ष की तरह है जो कि आधुनिकता से भी ओतप्रोत है।

आरएसएस कार्यकर्ता के तौर पर ही शुरू हुआ राजनीतिक सफर

पीएम मोदी ने कहा कि राष्ट्रीय चेताना का जो बीज 100 साल पहले बोया गया था वह एक वट वृक्ष का रूप ले चुका है। उन्होंने कहा कि आरएसएस के कार्यकर्ता पूरे देश में तन-मन से लोगों की सेवा कर रहे हैं। बता दें कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का सफर 1972 में आरएसएस प्रचारक के तौर पर ही शुरू हुआ था। उनकी सक्रियता के चलते ही उन्हें 2001 में गुजरात का मुख्यमंत्री बना दिया गया था।

आरएसएस के एक सीनियर पदाधिकारी ने कहा, इसमें कोई संदेह नहीं है कि बीजेपी का वैचारिक मेंटॉर आरएसएस है। इसके बावजूद बीजेपी ने आरएसएस से दूरी ही दिखाने की कोशिश की। सरकार और संघ का काम पूरी तरह अलग होता है। कई नेता इस बात को स्वीकार करते हैं कि उनका भविष्य आरएसएस की वजह से ही तय हो पाया है। फिर भी मैं यह स्पष्ट कर देना चाहता हूं कि आरएसएस कभी सरकार के कामकाज में कोई दखल नहीं देता है और ना ही इसका कोई राजनीतिक अजेंडा है।

आरएसएस से अनबन की भी थी चर्चा

2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान यह भी चर्चा थी की आरएसएस और बीजेपी की बन नहीं रही है। बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा ने यहां तक कहा था कि बीजेपी अब आत्मनिर्भर है। वहीं जब बीजेपी को हिंदी बेल्ट में सीटों का नुकसान हुआ तो आरएसएस प्रमुख ने भी कई बार इशारों-इशारों में खुले मंच पर नसीहत दे डाली। हालांकि लोकसभा में झटके के बाद बीजेपी ने फिर आरएसएस को अहमियत देनी शुरू की और इसका प्रभाव हरियाणा और महाराष्ट्र के विधानसभा चुनाव में दिखाई दिया। हालांकि आरएसएस नेता एचवी शेषाद्री ने कहा कि यह कोई डिबेट ही नहीं थी। जो लोग बीजेपी और आरएसएस दोनों को नहीं जानते हैं वही अनबन की अफवाह उड़ा रहे थे।

इसके अलावा दो अहम कार्यक्रम भी आने वाले दिनों में होने वाले हैं। एक है बेंगलुरु में होने वाली बीजेपी कार्यकारिणी की बैठक और दूसरी आरएसएस का शताब्दी वर्ष समारोह। ऐसे में दोनों ही संगठन अपने संबंधों को नई ऊंचाई देने में ललगे हैं। अगले महीने बेंगलुरु में होने वाली कार्यकारिणी की बैठक में बीजेपी नए राष्ट्रीय अध्यक्ष का भी ऐलान कर सकती है। ऐसे में पीएम मोदी का आरएसएस मुख्यालय जाना अहम मानाजा रहा है।

दो प्रधानमंत्रियों के दौरे के बीच कितना कुछ बदल चुका है?

पच्चीस साल के लंबे अंतराल के बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के आंगन में भारत के दूसरे प्रधानमंत्री की आमद हुई है. अटल बिहारी वाजपेयी ने बतौर प्रधानमंत्री संघ के दफ्तर का दौरा 27 अगस्त 2000 को किया था. ये संघ की स्थापना का 75वां साल था. अब 25 वर्ष बाद RSS की यात्रा के शताब्दी वर्ष में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नागपुर संघ मुख्यालय की यात्रा की है.

11 साल पहले प्रधानमंत्री बनने के बाद नागपुर में आरएसएस मुख्यालय की अपनी पहली यात्रा में नरेंद्र मोदी ने संघ को भारत की अमर संस्कृति का ‘वट वृक्ष’ बताया.

आरएसएस के एक पदाधिकारी ने बताया कि अटल बिहारी वाजपेयी ने प्रधानमंत्री के रूप में अपने तीसरे कार्यकाल के दौरान साल 2000 में यहां का दौरा किया था. संयोग है कि पीएम मोदी जब आरएसएस के दफ्तर पहुंचे हैं तो ये उनका तीसरा कार्यकाल है.

संघ भारतीय संस्कृति का अक्षय वटवृक्ष- मोदी

प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि हमारी संस्कृति को नष्ट करने के प्रयास किए गए भारतीय संस्कृति की चेतना कभी समाप्त नहीं हुई. स्वतंत्रता संग्राम से पूर्व डॉ.हेडगेवार और गुरुजी गोलवलकर ने भी इस राष्ट्रीय चेतना को बढ़ावा दिया. उन्होंने 100 वर्ष पहले जिस वटवृक्ष का बीजारोपण किया था, वह आज विशाल रूप में फैल चुका है. नरेंद्र मोदी ने कहा कि संघ का यह वटवृक्ष आदर्श और सिद्धांतों की वजह से टिक पाया है. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भारत की राष्ट्रीय संस्कृति का कभी न समाप्त होने वाला अक्षय वटवृक्ष है.

अब एक चौथाई सदी पहले उस मुलाकात की बात करते हैं जो तब हुई जब बतौर प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी संघ कार्यालय नागपुर पहुंचे थे.

RSS और भारतीय जनता पार्टी के रिश्ते को वैचारिक और संगठनात्मक रूप से गहरा माना जाता है, जो समय के साथ विकसित हुआ है

10 मार्च, 2000 को के एस सुदर्शन संघ के प्रमुख बने तो देश में पीएम की कुर्सी पर वो व्यक्ति था जो कभी स्वयंसेवक रहा था. लेकिन अटल बिहारी वाजपेयी  के जमाने में स्वदेशी जागरण मंच, विहिप, भारतीय मजदूर संघ, किसान संघ जैसे संघ के अनुषांगिक संगठनों से कई मौकों पर टकराव होता रहा.

हालांकि संघ के प्रति वाजपेयी की निष्ठा पर कोई सवाल ही नहीं था. 1995 में ऑर्गनाइजर में लिखे एक लेख में संघ को अपनी आत्मा बताया था. उन्होंने लिखा था, “आरएसएस के साथ लंबे जुड़ाव का सीधा कारण है कि मैं संघ को पसंद करता हूं. मैं उसकी विचारधारा पसंद करता हूं और सबसे बड़ी बात, लोगों के प्रति और एक दूसरे के प्रति आरएसएस का दृष्टिकोण मुझे भाता है और यह बस आरएसएस में मिलता है.”

अटल के प्रधानमंत्री बनने के बाद एक दौर ऐसा भी आया, जब उनके संघ से रिश्ते कुछ असहज हो चले थे. उस वक्त संघ और सहयोगी संगठनों के नेता व्यक्तिगत हमले करने से भी नहीं चूकते थे. जबकि संघ में व्यक्तिगत नहीं बल्कि नीतिगत आलोचना की परंपरा रही.

संघ विचारक दिलीप देवधर के अनुसार केएस सुदर्शन अपने विचारों को लेकर बहुत दृढ़ रहते थे. यह अटल बिहारी वाजपेयी जानते थे. यही वजह रहा कि भले ही रज्जू भईया ने उन्हें 1998 में उत्तराधिकारी घोषित कर दिया था, मगर उन्हें सर संघचालक का दायित्व देर से वर्ष 2000 में मिला.

देरी के पीछे संघ परिवार में यह चर्चा रहती है कि उस वक्त अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा था कि अगर सुदर्शन अभी बनते हैं तो सरकार चलाने में परेशानी होगी. ऐसे में जब देरी से दायित्व मिला तो भी सुदर्शन वाजपेयी को लेकर कुछ नाकारात्मक हुए. दरअसल, सुदर्शन को लगा कि वाजपेयी बीजेपी में होकर भी संघ की कार्यपद्धति में हस्तक्षेप करना चाहते हैं.

माना यह भई जाता है कि संघ में भले ही सुदर्शन सर संघचालक बन गए, मगर अटल बिहारी वाजपेयी उन्हें जूनियर ही मानते थे. ऐसे में जूनियर-सीनियर होने की वजह से भी कुछ मुद्दों पर टकराव होता रहा.

संघ और उसके अनुषांगिक संगठन (स्वदेशी जागरण मंच) सरकार की विनिवेश और उदारीकरण की नीतियों का विरोध कर रहे थे.  

तत्कालीन राष्ट्रपति अमेरिकी बिल क्लिंटन मार्च 2000 में भारत की यात्रा पर आए थे. इस दौरान दोनों देशों के बीच कई करार हुए थे.

वाजपेयी के इस दौरे का मुख्य मकसद सरकार और संघ के बीच बढ़ रहे मतभेदों को कम करना, आर्थिक नीतियों पर संघ को संतुष्ट करना, बीजेपी के तत्कालनी नए अध्यक्ष पर चर्चा करनाऔर भविष्य की रणनीति पर चर्चा करना था.

बता दें कि अगस्त 2000 में ही वाजपेयी ने बंगारु लक्ष्मण को बीजेपी का अध्यक्ष बनाया था. गौरतलब है कि 27 अगस्त 2000 को वाजपेयी ने संघ प्रमुख केएस सुदर्शन से मुलाकात की थी और 29 अगस्त 2000 को उन्हें बीजेपी का अध्यक्ष बनाया गया. राजनीतिक विशेषज्ञ बताते हैं कि इस मीटिंग में निश्चित रूप से बीजेपी के नए अध्यक्ष पर चर्चा हुई होगी.

वाजपेयी के दौर में BJP को RSS के मार्गदर्शन की जरूरत थी. वाजपेयी गठबंधन सरकार चला रहे थे, उनके पास संख्याबल का संकट था.  लेकिन उनकी व्यक्तिगत छवि और गठबंधन की मजबूरियों ने पार्टी को कुछ हद तक स्वायत्तता दी.

प्रधानमंत्री के रूप में वाजपेयी एक संतुलित दृष्टिकोण अपनाया. उन्होंने सरकार की नीतियों और RSS की विचारधारा के बीच संतुलन बनाए रखने का प्रयास किया. उनकी सरकार के दौरान, आर्थिक सुधारों और उदारीकरण की नीतियों पर RSS के साथ कुछ मतभेद उभरे, लेकिन संवाद और समन्वय के माध्यम से इनका समाधान किया गया.

PM मोदी की संघ कार्यालय की यात्रा

प्रधानमंत्री बनने के 11  साल बाद जब नरेंद्र मोदी नागपुर पहुंचे तो ये एक अहम घटनाक्रम था. अटल युग में भाजपा और संघ के रिश्ते “राजनीतिक स्वतंत्रता और वैचारिक मार्गदर्शन” के रूप में रहे, जबकि मोदी युग में ये संबंध “संघ की वैचारिक प्रतिबद्धता और सरकार की नीतिगत क्रियान्वयन” में बदल गए हैं.

दिल्ली में सरकार बनवाकर मुत्तमइन पीएम नरेंद्र मोदी 30 मार्च 2025 को संघ मुख्यालय नागपुर पहुंचे हैं. ये स्वयंसेवक मोदी के लिए deja vu अनुभव है. जब वे संघ मुख्यालय से राजनीति और राष्ट्रनीति सीख ले रहे थे.

बतौर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संघ के सभी बड़े एजेंडों को पूरा किया और करने की कोशिश कर रहे हैं- जैसे राम मंदिर, अनुच्छेद 370 की समाप्ति और समान नागरिक संहिता. RSS ने BJP को चुनावी रणनीति और जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं के जरिए समर्थन दिया. 2014 और 2019 के लोकसभा चुनावों में RSS के स्वयंसेवकों की सक्रिय भागीदारी ने BJP की जीत में अहम योगदान दिया.

लेकिन 2024 के चुनाव में स्थिति तब बदली जब बीजेपी के मौजूदा अध्यक्ष जेपी नड्डा का एक बयान आया. लोकसभा चुनाव से पहले नड्डा ने एक साक्षात्कार में कहा था, “शुरुआत में हमें RSS की जरूरत थी, लेकिन अब BJP अपने दम पर सक्षम है. हमारा संगठन बड़ा हो गया है और हम स्वतंत्र रूप से काम कर सकते हैं.”

यूं तो नड्डा का बयान BJP की बढ़ती संगठनात्मक ताकत और आत्मनिर्भरता की ओर इशारा कर रहा था. जो वाजपेयी के दौर से बिल्कुल अलग है. उस समय पार्टी RSS पर अधिक निर्भर थी.। 2014 के बाद BJP ने अपनी खुद की शक्ति (चुनावी मशीनरी, सदस्यता अभियान) विकसित की, जिससे वह RSS के बिना भी प्रभावी ढंग से काम कर सके.

लेकिन इस बयान की हवा तब निकल गई जब 2024 के नतीजे आए. बीजेपी को अपने दम पर बहुमत नहीं मिला और पार्टी 240 सीटों पर सिमट गई.

इस बयान ने RSS में कुछ नाराजगी पैदा की. RSS ने इसे पार्टी के “अहंकार” के रूप में देखा और जमीनी समन्वय की कमी को हार का कारण माना. मौजूदा सरसंघ चालक भागवत की ओर से प्रकारांतर से दिए गए बयानों ने इस तनाव को उजागर किया.  

संतुलन की कोशिश

हालांकि बीजेपी तक ‘मैसेज’ चले जाने के बाद RSS एक बार फिर से अपने पुराने रोल में आ गया. संघ ने हरियाणा, महाराष्ट्र और दिल्ली के विधानसभा चुनावों में बीजेपी की भरपूर मदद की और शानदार विजय श्री हासिल करने में पार्टी को मदद की.

संघ और बीजेपी के घटनाक्रमों पर पैनी नजर रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार विजय त्रिवेदी कहते हैं कि मुझे नहीं लगता है कि प्रधानमंत्री और सरसंघ चालक के बीच कोई गैप है. जो भी बात होती है, जो भी मैसेज होता है वो दोनों के बीच चलता रहता है.

उन्होंने कहा दो नेताओं के बीच औपचारिक मुलाकात का मतलब है कि कहीं न कहीं कोई गड़बड़ थी जिसे ठीक करने के लिए ये किया जा रहा है.मुझे लगता है कि इस सरकार में संघ के साथ सबसे बेहतर कम्युनिकेशन चल रहा है.

वरिष्ठ पत्रकार विजय त्रिवेदी ने जेपी नड्डा के बयान का भी जिक्र करते हुए कहा कि उनके बयान के बाद ऐसा लगा कि कुछ विवाद चल रहा है लेकिन केरल की बैठक में इस पर बातचीत हो गई. उन्होंने कहा कि वे नड्डा के बयान को गलत तरीके से नहीं देखते हैं. वैसे भी बीजेपी संघ से बड़ा संगठन हो ही गया है. लेकिन मातृ संगठन से कभी बड़ा नहीं हो सकता है. ये मुद्दा अब खत्म हो गया है.

पीएम मोदी के दौरे का एक मकसद नए बीजेपी अध्यक्ष की नियुक्ति भी है. गौरतलब है कि 2000 में नए अध्यक्ष की नियुक्ति से पहले PM वाजपेयी संघ दफ्तर गए थे. इस बार भी अब कभी भी बीजेपी के नए अध्यक्ष की घोषणा हो सकती है.
 

 

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